कार्यकारी सारांश: संवैधानिक संस्थाओं पर सुनियोजित हमला
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थागत गरिमा और संवैधानिक रेफरी की निष्पक्षता लोकतंत्र की धुरी होती है। जब कोई राजनीतिक या वैचारिक गिरोह जनसमर्थन जुटाने में विफल हो जाता है, तो उसकी पहली रणनीति चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की साख को नष्ट करने की होती है। हाल के दिनों में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के विरुद्ध चलाया गया अभियान इसी खतरनाक सोच का प्रमाण है।
1. CEC ज्ञानेश कुमार को निशाना क्यों बनाया जा रहा है?
अनुच्छेद 324 के तहत भारत का चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और अर्ध-न्यायिक संस्था है जिसने 7 दशकों से शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किए हैं। EVM पर सुप्रीम कोर्ट के 40 से अधिक फैसलों और 100% VVPAT मिलान के बाद भी सीजेपी (CJP) और वामपंथी तंत्र द्वारा संस्थागत संदेह के बीज बोना जनमत को गुमराह करने का प्रयास है।
2. स्कूलों में गैर-कानूनी घुसपैठ और बच्चों का शोषण
सोशल मीडिया पर सनसनीखेज रील्स बनाने और मोनेटाइजेशन के लिए खुद को 'स्वतंत्र पत्रकार' कहने वाले कार्यकर्ताओं द्वारा सरकारी स्कूलों और कक्षाओं में अनधिकृत घुसपैठ करना भारतीय न्याय संहिता (BNS) और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत गंभीर अपराध है। बच्चों की निजता का हनन और अध्यापकों का मानसिक उत्पीड़न किसी भी रूप में पत्रकारिता नहीं हो सकता।
3. मीडिया सिंडिकेट: जंतर-मंतर से कोर्टरूम पीआर तक
यह पूरा नैरेटिव स्वतंत्र नहीं है बल्कि एक सुगठित मीडिया तंत्र पर आधारित है। डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स द्वारा भावनात्मक वीडियो बनाए जाते हैं, जिन्हें 'द लल्लनटॉप' (सौरभ द्विवेदी) जैसे प्लेटफॉर्म्स और 'द इंडियन एक्सप्रेस' जैसे अखबारों द्वारा एकतरफा महिमामंडित किया जाता है। इसके बाद कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकील इसे अदालती पीआर तमाशे में बदलते हैं।
4. आम नागरिक का यथार्थ बनाम प्रायोजित आक्रोश
सोशल मीडिया के फर्जी आक्रोश के विपरीत, जमीन पर आम मतदाता और छात्र ECI की पारदर्शी व्यवस्था और डिजिटल सेवाओं (वोटर हेल्पलाइन) से संतुष्ट हैं। जम्मू-कश्मीर से लेकर महाराष्ट्र तक ऐतिहासिक मतदान इस बात का प्रमाण है कि भारतीय जनता का विश्वास अपनी संवैधानिक संस्थाओं में अटूट है।
5. सरकार और प्रशासन की अक्षम्य निष्क्रियता
संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव आयोग पर कीचड़ उछालने वालों, स्कूलों में अवैध घुसपैठ करने वालों और राष्ट्रीय व्यवस्था को बदनाम करने वाले गिरोहों पर समय रहते कठोर विधिक कार्रवाई न करना सरकारी ढिलाई का प्रमाण है। जब तक कानून का राज बिना किसी डर के लागू नहीं होगा, तब तक ये अराजक तत्व देश की शांति को अस्थिर करते रहेंगे।
6. निष्कर्ष
भारत का लोकतंत्र किसी एनजीओ, वामपंथी सिंडिकेट या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की जागीर नहीं है। देश की जनता और संविधान सर्वोपरि हैं। चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमले सीधे भारतीय लोकतंत्र पर प्रहार हैं जिन्हें दृढ़ता से कुचला जाना चाहिए।
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